Top 51+ Tulsidas Ke Dohe In Hindi With Meaning | तुलसीदास के दोहे

हेलो Googler, क्या आप Tulsidas Ke Dohe हिंदी में ढूंढ रहे हैं तो आप सही वेबसाइट पर आये हैं इस वेबसाइट में आपको तुलसीदास के दोहे हिंदी में अर्थ के साथ मिलेंगे जिन्हें आप आसानी से समझ सकते हैं

तुलसीदास जी का जीवन बहुत ही प्रेरणादायक और उनके सही विचारों को अपने मस्तिष्क में भरने का एक बहुत ही महत्वपूर्ण सोर्स है जो हमारी ज़िन्दगी को बहुत ही आनंदमयी और खुशहाल बनाने में बहुत ही मदद करेंगे। तो चलिए फिर शुरू करते हैं तुलसीदास जी के दोहे हिंदी में अर्थ के साथ पढ़कर अपने जीवन को सुखदायी बनाने।

Tulsidas Ke Dohe In Hindi With Meaning

Tulsidas Ke Dohe In Hindi With Meaning
बिना तेज के पुरुष की,… अवशि अवज्ञा होय ।
आगि बुझे ज्यों राख की,… आप छुवै सब कोय ।।

अर्थात – तेजहीन व्यक्ति की बात को कोई भी व्यक्ति महत्व नहीं देता है, उसकी आज्ञा का पालन कोई नहीं करता है. ठीक वैसे हीं जैसे, जब राख की आग बुझ जाती है, तो उसे हर कोई छूने लगता है.

तुलसी साथी विपत्ति के,… विद्या विनय विवेक ।
साहस सुकृति सुसत्यव्रत,… राम भरोसे एक ।।

अर्थात – तुलसीदास जी कहते हैं कि विपत्ति में अर्थात मुश्किल वक्त में ये चीजें मनुष्य का साथ देती है. ज्ञान, विनम्रता पूर्वक व्यवहार, विवेक, साहस, अच्छे कर्म, आपका सत्य और राम (भगवान) का नाम.

काम क्रोध मद लोभ की जौ लौं मन में खान ।
तौ लौं पण्डित मूरखौं तुलसी एक समान ।।

अर्थात – जब तक व्यक्ति के मन में काम की भावना, गुस्सा, अहंकार, और लालच भरे हुए होते हैं.
तबतक एक ज्ञानी व्यक्ति और मूर्ख व्यक्ति में कोई अंतर नहीं होता है, दोनों एक हीं जैसे होते हैं.

आवत ही हरषै नहीं नैनन नहीं सनेह ।
तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेह ।।

अर्थात – जिस स्थान या जिस घर में आपके जाने से लोग खुश नहीं होते हों और उन लोगों की आँखों में आपके लिए न तो प्रेम और न हीं स्नेह हो. वहाँ हमें कभी नहीं जाना चाहिए, चाहे वहाँ धन की हीं वर्षा क्यों न होती हो.

न दीनमो सम दीन हित तुम्ह समान रघुबीर
अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर ॥

अर्थात – हे रघुवीर, मेरे जैसा कोई दीनहीन नहीं है और तुम्हारे जैसा कोई दीनहीनों का भला करने वाला नहीं है. ऐसा विचार करके, हे रघुवंश मणि.. मेरे जन्म-मृत्यु के भयानक दुःख को दूर कर दीजिए.

कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम ।
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम ॥

अर्थात – जैसे काम के अधीन व्यक्ति को नारी प्यारी लगती है और लालची व्यक्ति को जैसे धन प्यारा लगता है. वैसे हीं हे रघुनाथ, हे राम, आप मुझे हमेशा प्यारे लगिए.

सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत ।
श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत ।।

अर्थात – हे उमा, सुनो वह कुल धन्य है, दुनिया के लिए पूज्य है और बहुत पावन (पवित्र) है, जिसमें श्री राम (रघुवीर) की मन से भक्ति करने वाले विनम्र लोग जन्म लेते हैं.

मसकहि करइ बिरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन ।
अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन ॥

अर्थात – राम मच्छर को भी ब्रह्मा बना सकते हैं और ब्रह्मा को मच्छर से भी छोटा बना सकते हैं.
ऐसा जानकर बुद्धिमान लोग सारे संदेहों को त्यागकर राम को ही भजते हैं.

तुलसी किएं कुंसग थिति, होहिं दाहिने बाम ।
कहि सुनि सुकुचिअ सूम खल, रत हरि संकंर नाम ।।
बसि कुसंग चाह सुजनता, ताकी आस निरास ।
तीरथहू को नाम भो, गया मगह के पास ।।

अर्थात – बुरे लोगों की संगती में रहने से अच्छे लोग भी बदनाम हो जाते हैं. वे अपनी प्रतिष्ठा गँवाकर छोटे हो जाते हैं. ठीक उसी तरह जैसे, किसी व्यक्ति का नाम भले हीं देवी-देवता के नाम पर रखा जाए, लेकिन बुरी संगती के कारण उन्हें मान-सम्मान नहीं मिलता है. जब कोई व्यक्ति बुरी संगती में रहने के बावजूद अपनी काम में सफलता पाना चाहता है और मान-सम्मान पाने की इच्छा करता है, तो उसकी इच्छा कभी पूरी नहीं होती है. ठीक वैसे हीं जैसे मगध के पास होने के कारण विष्णुपद तीर्थ का नाम “गया” पड़ गया.

सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर । होहिं बिषय रत मंद मंद तर ॥
काँच किरिच बदलें ते लेहीं । कर ते डारि परस मनि देहीं ॥

अर्थात – जो लोग मनुष्य का शरीर पाकर भी राम का भजन नहीं करते हैं और बुरे विषयों में खोए रहते हैं. वे लोग उसी व्यक्ति की तरह मूर्खतापूर्ण आचरण करते हैं, जो पारस मणि को हाथ से फेंक देता है और काँच के टुकड़े हाथ में उठा लेता है.

तुलसीदास के दोहे इमेज

तुलसीदास के दोहे इमेज
मुखिया मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक ।
पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित विवेक ।।

अर्थात – परिवार के मुखिया को मुँह के जैसा होना चाहिए, जो खाता-पीता मुख से है और शरीर के सभी अंगों का अपनी बुद्धि से पालन-पोषण करता है.

तुलसी जे कीरति चहहिं, पर की कीरति खोइ।
तिनके मुंह मसि लागहैं, मिटिहि न मरिहै धोइ।।

अर्थात – जो लोग दूसरों की निन्दा करके खुद सम्मान पाना चाहते हैं. ऐसे लोगों के मुँह पर ऐसी कालिख लग जाती है, जो लाखों बार धोने से भी नहीं हटती है.

बचन बेष क्या जानिए, मनमलीन नर नारि।
सूपनखा मृग पूतना, दस मुख प्रमुख विचारि।।

अर्थात – किसी की मीठी बातों और किसी के सुंदर कपड़ों से, किसी पुरुष या स्त्री के मन की भावना कैसी है यह नहीं जाना जा सकता है. क्योंकि मन से मैले सूर्पनखा, मारीच, पूतना और रावण के कपड़े बहुत सुन्दर थे.

तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर
सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि

अर्थात – किसी व्यक्ति के सुंदर कपड़े देखकर केवल मूर्ख व्यक्ति हीं नहीं बल्कि बुद्धिमान लोग भी धोखा खा जाते हैं . ठीक उसी प्रकार जैसे मोर के पंख और उसकी वाणी अमृत के जैसी लगती है, लेकिन उसका भोजन सांप होता है.

सचिव बैद गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास

अर्थात – मंत्री ( सलाहकार ), चिकित्सक और शिक्षक यदि ये तीनों किसी डर या लालच से झूठ बोलते हैं, तो राज्य,शरीर और धर्म का जल्दी हीं नाश हो जाता है.

एक अनीह अरूप अनामा । अज सच्चिदानन्द पर धामा ।
ब्यापक विश्वरूप भगवाना । तेहिं धरि देह चरित कृत नाना ।

अर्थात – भगवान एक हैं, उन्हें कोई इच्छा नहीं है. उनका कोई रूप या नाम नहीं है. वे अजन्मा औेर परमानंद के परमधाम हैं. वे सर्वव्यापी विश्वरूप हैं. उन्होंने अनेक रूप, अनेक शरीर धारण कर अनेक लीलायें की हैं.

सो केवल भगतन हित लागी । परम कृपाल प्रनत अनुरागी ।
जेहि जन पर ममता अति छोहू । जेहि करूना करि कीन्ह न कोहू ।

अर्थात – प्रभु भक्तों के लिये हीं सब लीला करते हैं. वे परम कृपालु और भक्त के प्रेमी हैं. भक्त पर उनकी ममता रहती है. वे केवल करूणा करते हैं. वे किसी पर क्रोध नही करते हैं.

जपहिं नामु जन आरत भारी । मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी ।
राम भगत जग चारि प्रकारा । सुकृति चारिउ अनघ उदारा ।

अर्थात – संकट में पड़े भक्त नाम जपते हैं तो उनके समस्त संकट दूर हो जाते हैं और वे सुखी हो जाते हैं. संसार में चार तरह के अर्थाथ; आर्त; जिज्ञासु और ज्ञानी भक्त हैं और वे सभी भक्त पुण्य के भागी होते हैं.

सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन
नाम सुप्रेम पियुश हृद तिन्हहुॅ किए मन मीन।

अर्थात – जो सभी इच्छाओं को छोड़कर राम भक्ति के रस में लीन होकर राम नाम प्रेम के सरोवर में अपने मन को मछली के रूप में रहते हैं और एक क्षण भी अलग नही रहना चाहते वही सच्चा भक्त है.

भगति निरुपन बिबिध बिधाना,…क्षमा दया दम लता विताना ।
सम जम नियम फूल फल ग्याना,… हरि पद रति रस बेद बखाना ।

अर्थात – अनेक तरह से भक्ति करना एवं क्षमा, दया, इन्द्रियों का नियंत्रण, लताओं के मंडप समान हैं. मन का नियमन अहिंसा, सत्य, अस्तेय ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्राणधन, भक्ति के फूल और ज्ञान फल है. भगवान के चरणों में प्रेम भक्ति का रस है. वेदों ने इसका वर्णन किया है.

झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें । जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचाने ।
जेहि जाने जग जाई हेराई । जागें जथा सपन भ्रम जाई ।

अर्थात – ईश्वर को नही जानने से झूठ सत्य प्रतीत होता है. बिना पहचाने रस्सी से सांप का भ्रम होता है. लेकिन ईश्वर को जान लेने पर संसार का उसी प्रकार लोप हो जाता है जैसे जागने पर स्वप्न का भ्रम मिट जाता है.

जिन्ह हरि कथा सुनी नहि काना । श्रवण रंध्र अहि भवन समाना ।

अर्थात – जिसने अपने कानों से प्रभु की कथा नही सुनी उसके कानों के छेद सांप के बिल के समान हैं.

जिन्ह हरि भगति हृदय नहि आनी । जीवत सब समान तेइ प्राणी ।
जो नहि करई राम गुण गाना । जीह सो दादुर जीह समाना ।

अर्थात – जिसने भगवान की भक्ति को हृदय में नही लाया वह प्राणी जीवित मूर्दा के समान है. जिसने प्रभु के गुण नही गाया उसकी जीभ मेंढ़क की जीभ के समान है.

कुलिस कठोर निठुर सोई छाती । सुनि हरि चरित न जो हरसाती

अर्थात – तुलसीदास जी कहते हैं – उसका हृदय बज्र की तरह कठोर और निश्ठुर है जो ईश्वर का चरित्र सुनकर प्रसन्न नही होता है.

सगुनहि अगुनहि नहि कछु भेदा । गाबहि मुनि पुराण बुध भेदा।
अगुन अरूप अलख अज जोई। भगत प्रेम बश सगुन सो होई।

अर्थात – तुलसीदास जी कहते हैं – सगुण और निर्गुण में कोई अंतर नही है. मुनि पुराण पन्डित बेद सब ऐसा कहते. जेा निर्गुण निराकार अलख और अजन्मा है वही भक्तों के प्रेम के कारण सगुण हो जाता है.

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हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहु बिधि सब संता।
रामचंन्द्र के चरित सुहाए।कलप कोटि लगि जाहि न गाए।

अर्थात – भगवान अनन्त है, उनकी कथा भी अनन्त है. संत लोग उसे अनेक प्रकार से वर्णन करते हैं. श्रीराम के सुन्दर चरित्र करोड़ों युगों मे भी नही गाये जा सकते हैं.

प्रभु जानत सब बिनहि जनाएँ ।कहहुॅ कवनि सिधि लोक रिझाए।

अर्थात – तुलसीदास जी कहते हैं – प्रभु तो बिना बताये हीं सब जानते हैं. अतः संसार को प्रसन्न करने से कभी भी सिद्धि प्राप्त नही हो सकती.

तपबल तें जग सुजई बिधाता। तपबल बिश्णु भए परित्राता।
तपबल शंभु करहि संघारा। तप तें अगम न कछु संसारा।

अर्थात – तपस्या से कुछ भी प्राप्ति दुर्लभ नही है. इसमें शंका आश्चर्य करने की कोई जरूरत नही है. तपस्या की शक्ति से हीं ब्रह्मा ने संसार की रचना की है और तपस्या की शक्ति से ही विष्णु इस संसार का पालन करते हैं. तपस्या द्वारा हीं शिव संसार का संहार करते हैं. दुनिया में ऐसी कोई चीज नही जो तपस्या द्वारा प्राप्त नही किया जा सकता है.

हरि ब्यापक सर्वत्र समाना।प्रेम ते प्रगट होहिं मै जाना।
देस काल दिशि बिदि सिहु मांही। कहहुॅ सो कहाॅ जहाॅ प्रभु नाहीं।

अर्थात – तुलसीदास जी कहते हैं – भगवान सब जगह हमेशा समान रूप से रहते हैं और प्रेम से बुलाने पर प्रगट हो जाते हैं. वे सभी देश विदेश एव दिशाओं में ब्याप्त हैं. कहा नही जा सकता कि प्रभु कहाँ नही है.

तुम्ह परिपूरन काम जान सिरोमनि भावप्रिय
जन गुन गाहक राम दोस दलन करूनायतन।

अर्थात – तुलसीदास जी कहते हैं – प्रभु पूर्णकाम सज्जनों के शिरोमणि और प्रेम के प्यारे हैं. प्रभु भक्तों के गुणग्राहक बुराईयों का नाश करने वाले और दया के धाम हैं.

करहिं जोग जोगी जेहि लागी। कोहु मोहु ममता मदु त्यागी।
व्यापकु ब्रह्मु अलखु अविनासी। चिदानंदु निरगुन गुनरासी।

अर्थात – योगी जिस प्रभु के लिये क्रोध मोह ममता और अहंकार को त्यागकर योग साधना करते हैं – वे सर्वव्यापक ब्रह्म अब्यक्त अविनासी चिदानंद निर्गुण और गुणों के खान हैं.

मन समेत जेहि जान न वानी। तरकि न सकहिं सकल अनुमानी।
महिमा निगमु नेति कहि कहई। जो तिहुॅ काल एकरस रहई।

अर्थात – जिन्हें पूरे मन से शब्दों द्वारा ब्यक्त नहीं किया जा सकता-जिनके बारे में कोई अनुमान नही लगा सकता – जिनकी महिमा बेदों में नेति कहकर वर्णित है और जो हमेशा एकरस निर्विकार रहते हैं.

जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि विलोकत पातक भारी।
निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरू समाना।

अर्थात – तुलसीदास जी कहते हैं – जो मित्र के दुख से दुखी नहीं होता है उसे देखने से भी भारी पाप लगता है. अपने पहाड़ समान दुख को धूल के बराबर और मित्र के साधारण धूल समान दुख को सुमेरू पर्वत के समान समझना चाहिए.

जिन्ह कें अति मति सहज न आई। ते सठ कत हठि करत मिताई।
कुपथ निवारि सुपंथ चलावा । गुन प्रगटै अबगुनन्हि दुरावा।

अर्थात – जिनके स्वभाव में इस प्रकार की बुद्धि न हो वे मूर्ख केवल जिद करके हीं किसी से मित्रता करते हैं. सच्चा मित्र गलत रास्ते पर जाने से रोककर सही रास्ते पर चलाता है और अवगुण छिपाकर केवल गुणों को प्रकट करता है.

देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई।
विपति काल कर सतगुन नेहा। श्रुति कह संत मित्र गुन एहा।

अर्थात – मित्र से लेन देन करने में शंका न करे. अपनी शक्ति अनुसार हमेशा मित्र की भलाई करे. वेद के अनुसार संकट के समय वह सौ गुणा स्नेह-प्रेम करता है. अच्छे मित्र के यही गुण हैं.

आगें कह मृदु वचन बनाई। पाछे अनहित मन कुटिलाई।
जाकर चित अहिगत सम भाई। अस कुमित्र परिहरेहि भलाई।

अर्थात – जो सामने बना-बनाकर मीठा बोलता है और पीछे मन में बुरी भावना रखता है तथा जिसका मन सांप की चाल के जैसा टेढा है ऐसे खराब मित्र को त्यागने में हीं भलाई है.

सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं। माया कृत परमारथ नाहीं।

अर्थात – इस संसार में सभी शत्रु और मित्र तथा सुख और दुख, माया झूठे हैं और वस्तुतः वे सब बिलकुल नहीं हैं.

सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।

अर्थात – तुलसीदास जी कहते हैं – देवता, आदमी, मुनि – सबकी यही रीति है कि सब अपने स्वार्थपूर्ति हेतु हीं प्रेम करते हैं.

कठिन कुसंग कुपंथ कराला। तिन्ह के वचन बाघ हरि ब्याला।
गृह कारज नाना जंजाला। ते अति दुर्गम सैल विसाला।

अर्थात – खराब संगति अत्यंत बुरा रास्ता है. उन कुसंगियों के बोल बाघ, सिंह और सांप की भांति हैं. घर के कामकाज में अनेक झंझट ही बड़े बीहड़ विशाल पहाड़ की तरह हैं.

सुभ अरू असुभ सलिल सब बहई। सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई।
समरथ कहुॅ नहि दोश् गोसाईं। रवि पावक सुरसरि की नाई।

अर्थात – तुलसीदास जी कहते हैं – गंगा में पवित्र और अपवित्र सब प्रकार का जल बहता है परन्तु कोई भी गंगाजी को अपवित्र नही कहता. सूर्य, आग और गंगा की तरह समर्थ व्यक्ति को कोई दोष नही लगाता है.

तुलसी देखि सुवेसु भूलहिं मूढ न चतुर नर
सुंदर के किहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि।

हिंदी अर्थ – सुंदर वेशभूशा देखकर मूर्ख हीं नही चतुर लोग भी धोखा में पर जाते हैं. मोर की बोली बहुत प्यारी अमृत जैसा है परन्तु वह भोजन सांप का खाता है.

बडे सनेह लघुन्ह पर करहीं। गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं।
जलधि अगाध मौलि बह फेन। संतत धरनि धरत सिर रेनू।

अर्थात – तुलसीदास जी कहते हैं – बडे लोग छोटों पर प्रेम करते हैं. पहाड के सिर में हमेशा घास रहता है. अथाह समुद्र में फेन जमा रहता है एवं धरती के मस्तक पर हमेशा धूल रहता है.

बैनतेय बलि जिमि चह कागू। जिमि ससु चाहै नाग अरि भागू।
जिमि चह कुसल अकारन कोही। सब संपदा चहै शिव द्रोही।
लोभी लोलुप कल कीरति चहई। अकलंकता कि कामी लहई।

हिंदी अर्थ – यदि गरूड का हिस्सा कौआ और सिंह का हिस्सा खरगोश चाहे – अकारण क्रोध करने वाला अपनी कुशलता और शिव से विरोध करने वाला सब तरह की संपत्ति चाहे – लोभी अच्छी कीर्ति और कामी पुरूष बदनामी और कलंक नही चाहे तो उन सभी की इच्छाएं व्यर्थ हैं.

ग्रह भेसज जल पवन पट पाई कुजोग सुजोग।
होहिं कुवस्तु सुवस्तु जग लखहिं सुलक्षन लोग।

हिंदी अर्थ – ग्रह दवाई पानी हवा वस्त्र -ये सब कुसंगति और सुसंगति पाकर संसार में बुरे और अच्छे वस्तु हो जाते हैं. ज्ञानी और समझदार लोग ही इसे जान पाते हैं.

को न कुसंगति पाइ नसाई। रहइ न नीच मतें चतुराई।

अर्थात – तुलसीदास जी कहते हैं – खराब संगति से सभी नष्ट हो जाते हैं. नीच लोगों के विचार के अनुसार चलने से चतुराई, बुद्धि भ्रष्ट हो जाती हैं .

तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।

हिंदी अर्थ – यदि तराजू के एक पलड़े पर स्वर्ग के सभी सुखों को रखा जाये तब भी वह एक क्षण के सतसंग से मिलने बाले सुख के बराबर नहीं हो सकता.

सुनहु असंतन्ह केर सुभाउ। भूलेहु संगति करिअ न काउ।
तिन्ह कर संग सदा दुखदाई। जिमि कपिलहि घालइ हरहाई।

हिंदी अर्थ – अब असंतों का गुण सुनें। कभी भूलवश भी उनका साथ न करें। उनकी संगति हमेशा कश्टकारक होता है। खराब जाति की गाय अच्छी दुधारू गाय को अपने साथ रखकर खराब कर देती है।

खलन्ह हृदयॅ अति ताप विसेसी । जरहिं सदा पर संपत देखी।
जहॅ कहॅु निंदासुनहि पराई। हरसहिं मनहुॅ परी निधि पाई।

हिंदी अर्थ – दुर्जन के हृदय में अत्यधिक संताप रहता है। वे दुसरों को सुखी देखकर जलन अनुभव करते हैं. दुसरों की बुराई सुनकर खुश होते हैं जैसे कि रास्ते में गिरा खजाना उन्हें मिल गया हो।

काम क्रोध मद लोभ परायन। निर्दय कपटी कुटिल मलायन।
वयरू अकारन सब काहू सों। जो कर हित अनहित ताहू सों।

अर्थात – वे काम, क्रोध, अहंकार, लोभ के अधीन होते हैं। वे निर्दयी, छली, कपटी एवं पापों के भंडार होते हैं। वे बिना कारण सबसे दुशमनी रखते हैं। जो भलाई करता है वे उसके साथ भी बुराई ही करते हैं।

झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चवेना।
बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा। खाइ महा अति हृदय कठोरा।

अर्थात – दुष्ट का लेनादेना सब झूठा होता है। उसका नाश्ता भोजन सब झूठ ही होता है जैसे मोर बहुत मीठा बोलता है. पर उसका दिल इतना कठोर होता है कि वह बहुत विषधर सांप को भी खा जाता है। इसी तरह उपर से मीठा बोलने बाले अधिक निर्दयी होते हैं।

पर द्रोही पर दार पर धन पर अपवाद
तें नर पाॅवर पापमय देह धरें मनुजाद।

हिंदी अर्थ – वे दुसरों के द्रोही परायी स्त्री और पराये धन तथा पर निंदा में लीन रहते हैं। वे पामर और पापयुक्त मनुष्य शरीर में राक्षस होते हैं।

लोभन ओढ़न लोभइ डासन। सिस्नोदर नर जमपुर त्रास ना।
काहू की जौं सुनहि बड़ाई। स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई।

हिंदी अर्थ – लोभ लालच हीं उनका ओढ़ना और विछावन होता है।वे जानवर की तरह भोजन और मैथुन करते हैं। उन्हें यमलोक का डर नहीं होता।किसी की प्रशंसा सुनकर उन्हें मानो बुखार चढ़ जाता है।

जब काहू कै देखहिं बिपती। सुखी भए मानहुॅ जग नृपति।
स्वारथ रत परिवार विरोधी। लंपट काम लोभ अति क्रोधी।

अर्थात – वे जब दूसरों को विपत्ति में देखते हैं तो इस तरह सुखी होते हैं जैसे वे हीं दुनिया के राजा हों। वे अपने स्वार्थ में लीन परिवार के सभी लोगों के विरोधी, काम वासना और लोभ में लम्पट एवं अति क्रोधी होते हैं।

मातु पिता गुर विप्र न मानहिं। आपु गए अरू घालहिं आनहि।
करहिं मोहवस द्रोह परावा। संत संग हरि कथा न भावा।

अर्थात – वे माता पिता गुरू ब्राम्हण किसी को नही मानते। खुद तो नष्ट रहते ही हैं. दूसरों को भी अपनी संगति से बर्बाद करते हैं। मोह में दूसरों से द्रोह करते हैं। उन्हें संत की संगति और ईश्वर की कथा अच्छी नहीं लगती है।

अवगुन सिधुं मंदमति कामी। वेद विदूसक परधन स्वामी।
विप्र द्रोह पर द्रोह बिसेसा। दंभ कपट जिए धरें सुवेसा।

अर्थात – वे दुर्गुणों के सागर, मंदबुद्धि, कामवासना में रत वेदों की निंदा करने बाला जबरदस्ती दूसरों का धन लूटने वाला, द्रोही विशेषत: ब्राह्मनों के शत्रु होते हैं। उनके दिल में घमंड और छल भरा रहता है पर उनका लिबास बहुत सुन्दर रहता है।

भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी।
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सत संगति संसृति कर अंता।

हिंदी अर्थ – भक्ति स्वतंत्र रूप से समस्त सुखों की खान है। लेकिन बिना संतों की संगति के भक्ति नही मिल सकती है। पुनः बिना पुण्य अर्जित किये संतों की संगति नहीं मिलती है। संतों की संगति हीं जन्म मरण के चक्र से छुटकारा देता है।

जेहि ते नीच बड़ाई पावा।सो प्रथमहिं हति ताहि नसाबा।
धूम अनल संभव सुनु भाई।तेहि बुझाव घन पदवी पाई।

हिंदी अर्थ – नीच आदमी जिससे बड़प्पन पाता है वह सबसे पहले उसी को मारकर नाश करता है। आग से पैदा धुंआ मेघ बनकर सबसे पहले आग को बुझा देता है।

रज मग परी निरादर रहई। सब कर पद प्रहार नित सहई।
मरूत उड़ाव प्रथम तेहि भरई। पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई।

हिंदी अर्थ – धूल रास्ते पर निरादर पड़ी रहती है और सभी के पैर की चोट सहती रहती है। लेकिन हवा के उड़ाने पर वह पहले उसी हवा को धूल से भर देती है। बाद में वह राजाओं के आँखों और मुकुटों पर पड़ती है।

सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा। बुध नहिं करहिं अधम कर संगा।
कवि कोविद गावहिं असि नीति। खल सन कलह न भल नहि प्रीती।

हिंदी अर्थ – बुद्धिमान मनुष्य नीच की संगति नही करते हैं। कवि एवं पंडित नीति कहते हैं कि दुष्ट से न झगड़ा अच्छा है न हीं प्रेम।

उदासीन नित रहिअ गोसांई। खल परिहरिअ स्वान की नाई।

हिंदी अर्थ – दुष्ट से सर्वदा उदासीन रहना चाहिये। दुष्ट को कुत्ते की तरह दूर से ही त्याग देना चाहिये।

अंतिम शब्द

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